रुदाली – एक विलुप्त प्रजाति?

पुराने दिनों में रुदालियाँ हुआ करती थी। किसी भी परिवार में यदि कोई मृत्यु हो जाती तो यह रुदालियाँ वहां बुलाई जाती थी और शोक व्यक्त करते हुए रोती थी। कभी कभी ऐसा करना अनिवार्य भी हो जाता क्योंकि परिवार के कुछ सदस्य शोकग्रस्त अवस्था में रोते नहीं थे और अपने परिजनों की मृत्यु के शोक को अपने अन्दर ही दबा कर के रखते थे। ऐसा करना, स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक हो सकता है और ऐसे अत्यंत शोक के समय में रोना अनिवार्य एवं उचित भी है।

इन रुदालियों को इसी कारण बुलाया जाता था की वे रोने का वातावरण बना सके और जो लोग रो नहीं रहे वे रो कर के अपना मन हल्का कर लें। धीरे धीरे यह प्रजाति विलुप्त होती गयी। आज भी शायद राजस्थान के किसी गाँव कस्बे  में शायद पायी जाए।

परंतु, यहाँ सोचने वाला विषय यह है कि यह अकारण रोने का पेशा औरतों को ही क्यूँ दिया गया? आदमियों को क्यों नहीं?

यही नहीं, औरतों ने भी इस पेशे को बड़े चाव से अपनाया और आगे भी बढ़ाया। इस विषय पर “Rudaali” नामक एक हिंदी फिल्म भी बन चुकी है जो कि इनके जीवन पर एक झलकी समान है।

यह हो सकता है की आज के इस आधुनिक युग में रुदालियाँ एक विलुप्त प्रजाति सी प्रतीत हो रही हैं परन्तु मेरा यह मानना है की ऐसा कहना सही नहीं है ।

रुदालियाँ अब एक विलुप्त प्रजाति ना रह कर लगभग हर जगह पायी जाती हैं और वे पुरुषों के लिए एक संयुक्त आघाती प्रमाणित हो रहीं हैं। चौंका देने वाली बात यह है की आज के युग में रुदाली के विषय में जब कुछ सुनाई नहीं देता तो रुदालियाँ एक संयुक्त आघाती बनी किस प्रकार?

इसके लिए आइये पहले यह समझ लें की एक रुदाली करती क्या है?

१. रुदाली अकारण रोती हैं – अधिकांश महिलाएं भी अकारण रोती हैं कि पुरुष उन्हें सता रहे हैं।

२. रुदाली को रोने के लिए पैसे मिलते हैं – अधिकांश महिलाएं को भी रोने की वजह से पुरुष से पैसे मिलते हैं।

३. रोना रुदाली का पेशा होता है – एक बहुत बड़े तबके की महिलाओं ने अकारण रोकर निर्दोष पुरुषों को फंसा कर कमाने का पेशा बना रखा है।

रुदाली और आजकल की औरतों में बस इतना अन्तर है कि, रुदाली किसी की मृत्यु पर रोती हैं, जबकि इन औरतों के अकारण रोने और दोषारोपण के कारण कई पुरुषों की असमय मृत्यु हो जाती है।

औरतों के इस अकारण रोने की वजह से समाज, पुरुषवर्ग पर दबाव बनाता तथा पुरुष तनावग्रसित होते  है।

किन्तु समस्या यह नहीं की औरतें केवल मात्र एक रुदाली की भांति रो रही हैं, समस्या यह है कि समाज और अधिकाँश पुरुषवर्ग औरतों के इस रोने को आवश्यकता से अधिक गंभीरता से ले रहा है जिसके कारणवश पुरुषों के साथ असंवेंदंशील व्यवहार हो रहा है।

इसके लिए दोषी भी पुरुषों को ठहराया जा रहा है। औरतों ने अपना जीवन सरल कर लिया है – बिना कोई दायित्व का पालन करे, बस रो दो और किसी भी पुरुष पर दोषारोपण कर दो, शेष काम करती है समाज में प्रचलित पुरुष-घृणा की भावना।

वह जो रुदाली की एक प्रतिभा थी जिससे मृत्योपरांत शोक की अभिव्यक्ति एक सुलझे हुए रूप से हो पाती थी, आज उसी प्रतिभा का दुरूपयोग कर हर एक स्त्री को एक विनाशकारी रुदाली में परिवर्तित करने की कोशिश कायम है। जो औरत आज के वर्तमान नारीवाद के ढाँचे और परिभाषा के अनुसार रुदाली नहीं बनना चाहती, उसका बहिष्कार कर दिया जाता है ।

इसलिए, यह सोचना अनिवार्य हो गया है कि क्या यह बात सच है कि रुदाली एक विलुप्त प्रजाति हो गयी है? यदि आपको ऐसी कोई रुदाली दिखे, जो की अकारण रो कर किसी पुरुष को दोषी ठहरा रही है तो सावधान रहें, हो सकता है आपके हाथों किसी निर्दोष पुरुष को दंड मिल जाए!

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4 thoughts on “रुदाली – एक विलुप्त प्रजाति?

  1. yeah makes so much of sense. this world economy is under pressure of these RUDALIs..
    We must be cautious while listening to a cry of a women, they are often to get something out, manipulate someone and to get money most of the times. If you ignore the cry ..they stop crying after realizing that it may not yield anything. So yeah..take care !

  2. Don’t go by women’s crocodile tears. It’s their biggest weapon to blackmail men. Which men have failed to understand as society has set Protector and Provider as their duty. It’s time to come out of this mindset.

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